धूप के लिए!

मेरे मित्र और बड़े भाई जैसे, पटना निवासी वरिष्ठ कवि एवं नवगीतकार श्री सत्यनारायण जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| बहुत अरसा हो गया सत्यनारायण जी से मिले, दो बार मैंने उन्हें एनटीपीसी के कवि सम्मेलनों में भी आमंत्रित करके उनके स्तरीय संचालन और सुंदर काव्य पाठ का आनंद लिया था|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सत्यनारायण जी का यह नवगीत–

अब बहुत
छलने लगी है छाँव
चलो, चलकर धूप के हो लें!

थम नहीं पाते
कहीं भी पाँव
मानसूनी इन हवाओं के
हो रहे
पन्ने सभी बदरंग
जिल्द में लिपटी कथाओं के
एक रस वे बोल
औरों के
और कितनी बार हम बोलें!

दाबकर पंजे
ढलानों से
उतरता आ रहा सुनसान
फ़ायदा क्या
पत्रियों की चरमराहट पर
लगाकर कान
मुट्ठियों में
फड़फड़ाते दिन
गीत-गंधी पर कहां तोलें!


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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