आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय और सृजनशील नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहूँ| कविताओं का शौक पैदा होने के बाद जिन कवियों को मैंने गोष्ठियों में और काव्य मंचों से बड़े चाव से सुना और उनके सानिध्य का मौका भी मिला उनमें स्वर्गीय रमेश रंजक भी शामिल थे| रमेश जी नवगीत के लिए समर्पित दुर्लभ रचनाकार थे, दुर्भाग्य से विधाता उन्हें ज्यादा लंबी उम्र नहीं दी थी और दूरदर्शन के लिए एक कार्यक्रम में कविता पाठ करते हुए ही उनको हार्ट अटैक आया जो उनके प्राण लेकर ही गया|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

जितने-जितने सभ्य हुए हैं
सचमुच बहुत असभ्य हुए हैं !
इन्हें-उन्हें दे कर नज़राना
अपना खाना-पीना जाना
सुख-सुविधाओं की किश्तों में
जीना और महीना जाना
मानव होकर मानव के हित
कितनी बार अलभ्य हुए हैं !
सब जाना ज़िन्दगी न जानी
जड़ता में जड़ रही अजानी
पेट परम सुख के चक्कर में
कथा आधुनिक व्यथा पुरानी
जितनी गुण-ग्राहकता छीजी
अवगुण उतने भव्य हुए हैं !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a comment