समर निंद्य है, भाग-1

आज मैं सबसे पहले सभी साथियों को स्वाधीनता दिवस, हमारी आजादी के अमृत महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ| आज इस अवसर पर मैं राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, इस कविता का संदर्भ ‘महाभारत’ का है, एक ही शीर्षक से दिनकर जी ने कई कविताएं लिखी हैं, जिनमें से यह पहली है, इस कविता में यह कहा गया है कि युद्ध अच्छा विकल्प नहीं है परंतु अन्यायपूर्ण शासन बना रहने देना बिल्कुल ठीक नहीं है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की यह कविता –

समर निंद्य है धर्मराज, पर,
कहो, शान्ति वह क्या है,
जो अनीति पर स्थित होकर भी
बनी हुई सरला है?

सुख-समृद्धि का विपुल कोष
संचित कर कल, बल, छल से,
किसी क्षुधित का ग्रास छीन,
धन लूट किसी निर्बल से।

सब समेट, प्रहरी बिठला कर
कहती कुछ मत बोलो,
शान्ति-सुधा बह रही न इसमें
गरल क्रान्ति का घोलो।

हिलो-डुलो मत, हृदय-रक्त
अपना मुझको पीने दो,
अचल रहे साम्राज्य शान्ति का,
जियो और जीने दो।

सच है सत्ता सिमट-सिमट

जिनके हाथों में आयी,
शान्तिभक्त वे साधु पुरुष
क्यों चाहें कभी लड़ाई ?

सुख का सम्यक-रूप विभाजन
जहाँ नीति से, नय से
संभव नहीं; अशान्ति दबी हो
जहाँ खड्ग के भय से,

जहाँ पालते हों अनीति-पद्धति
को सत्ताधारी,
जहाँ सूत्रधर हों समाज के
अन्यायी, अविचारी;

नीतियुक्त प्रस्ताव सन्धि के
जहाँ न आदर पायें;
जहाँ सत्य कहने वालों के
सीस उतारे जायें;


जहाँ खड्ग-बल एकमात्र
आधार बने शासन का;
दबे क्रोध से भभक रहा हो
हृदय जहाँ जन-जन का;

सहते-सहते अनय जहाँ
मर रहा मनुज का मन हो;
समझ कापुरुष अपने को
धिक्कार रहा जन-जन हो;


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “समर निंद्य है, भाग-1”

  1. स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      आपको भी स्वाधीनता दिवस और आज़ादी के अमृत महोत्सव को हार्दिक बधाई।

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