मेरा मींजा दिल!

स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ, प्रयोगवाद और नई कविता के दौर में इस तरह की कविताएं भी लिखी जातीं थी इसके एक उदाहरण के रूप में इसे देख लीजिए|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की यह कविता –

एक शोर में अगली सीट पे था
दुनिया का सबसे मीठा गाना
एक हाथ में मींजा दिल था मेरा
एक हाथ में था दिन का खाना।

इस डर से कि बस रुक जाएगी
आवाज़ जहाँ मैं दे दूँगा
मैं सुनता था। कोई छू ले कहीं
मेरी पीठ नहीं- आना जाना लोगों का
हँसना गन्‍धाना- सीने में भरे साबूदाना
दाँतों की चमक सुथरी नाकें- वह रोज़-रोज़
इस रोज़ आज कल भी मुझ पर झुक जाएगी
सूखी लड़की। चेहरा चेहरे चेहरों के मुँह
गाढ़े गोरे पक्‍के खुश चुप। अनजाने बेमन मुस्‍काना

मोटे बुजदिल। घुप। शहरों के।
तब मैं समझा
वह अनिता थी
अनिता? वह सीधी सलोतरी अपनी अनिता थी
रोज़ाना
जब तेज़ हुई बस
मैंने अंग्रेज़ी में कहा
ला कबाना

कोई सुन न सका।
मेरी खुशहाली के दिन में
मुझसे दो आने ले न सका। मैं हो न सका
मैं सो न सका। मैं रो न सका। मैं पों न सका
पों क्‍या माने?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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