तमाम ग़ुंचे तो खिला नहीं करते!

हर इक दुआ के मुक़द्दर में कब हुज़ूरी है,
तमाम ग़ुंचे तो ‘अमजद’ खिला नहीं करते|

अमजद इस्लाम अमजद

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