आज फिर से अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ, अज्ञेय जी प्रयोगवाद और उसके बाद नई कविता के द्वार खोलने वाले प्रमुख कवि थे, साहित्य की सभी विधाओं में उनका प्रमुख योगदान था, उनका उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ अदभुद था|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन जी की यह कविता, जिनको हम ‘अज्ञेय’ नाम से जानते हैं –

कुछ चीज़ें होती हैं जो
जहाँ तक जाती हैं वहीं तक जाती हैं।
उनसे
आगे कोई द्वार नहीं खुलते।
कुछ चीजें
होती हैं जो कहीं नहीं जातीं
न कहीं ले जाती हैं
पर जिन से द्वार
खुलते हैं
और खुलते जाते हैं
और हम उनके पार
होते जाते हैं।
इतनी दूर कि कभी सहम कर
लौटने को भी हो आते हैं
पर वहाँ से जो होता है लौटना नहीं होता :
नयी यात्रा होती है
मुड़ कर, थम कर
बिलम कर, रम कर।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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