हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर जी की एक प्रभावशाली कविता आज प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें भूखे लोगों के बीच एक रोटी का महत्व बताया गया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता –

कितनी रोटी
गाँव में अकाल था,
बुरा हाल था।
एक बुढ़ऊ ने
समय बिताने को,
यों ही पूछा
मन बहलाने को-
ख़ाली पेट पर
कितनी रोटी खा सकते हो
गंगानाथ ?
गंगानाथ बोला-
सात !
बुढ़ऊ बोला-
ग़लत !
बिलकुल ग़लत कहा,
पहली रोटी
खाने के बाद
पेट ख़ाली कहाँ रहा।
गंगानाथ,
यही तो मलाल है,
इस समय तो
सिर्फ़ एक रोटी का सवाल है।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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