ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं!

आज मैं मुशायरों और कवि सम्मेलनों की मशहूर शायरा सुश्री अंजुम रहबर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| अंजुम जी का अंदाज़ ए बयां अलग तरह का रहा है| उनकी एक रचना काफी प्रसिद्ध है- ‘छुक-छुक, छुक-छुक रेल चली है जीवन की’|

लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री अंजुम रहबर जी यह ग़ज़ल –

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं

वो बे-वफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं
कह दूँगी मैं भी साफ़ कि पहचानती नहीं

समझाया बार-हा कि बचो प्यार-व्यार से
लेकिन कोई सहेली कहा मानती नहीं

मैं ने तुझे मुआ’फ़ किया जा कहीं भी जा
मैं बुज़दिलों पे अपनी कमाँ तानती नहीं

‘अंजुम’ पे हँस रहा है तो हँसता रहे जहाँ
मैं बे-वक़ूफ़ियों का बुरा मानती नहीं।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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