क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें!

तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा,
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें|

अहमद फ़राज़

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