हिन्दी के एक और प्रतिष्ठित नवगीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| गाँव में किसानों की दयनीय दशा को दर्शाता और हौसला बढ़ाता यह गीत अत्यंत प्रभावी है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत –

अब तो यह मत कहो
कि तुममें रीढ़ नहीं है
तुम में ज़िन्दा
अब भी
पतली मेंड़
गई जोत में
फिर भी आधी अब भी बाकी है
ढेलों में साँसों की ख़ातिर
घर की चाकी है
एहसासों के हर किवाड़ को
रखना
मन में भेड़
सुलगा कर
कोनों में रखना देहों की तापें
खुद से दूर न होंगी
अपनी पुश्तैनी
नापें
बिस्वे होंगे बीघे होंगे
खेती
अपनी छेड़
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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