आज फिर से मैं हमारे राष्ट्रकवि के रूप में सम्मान पाने वाले स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी ने सामान्यतः लंबी लंबी कविताएं और काव्य लिखे हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की प्रेम पर लिखी यह छोटी परंतु असरदार रचना –

सिंधुतट की बालुका पर जब लिखा मैंने तुम्हारा नाम
याद है, तुम हँस पड़ी थीं, ‘क्या तमाशा है
लिख रहे हो इस तरह तन्मय
कि जैसे लिख रहे होओ शिला पर।
मानती हूँ, यह मधुर अंकन अमरता पा सकेगा।
वायु की क्या बात? इसको सिंधु भी न मिटा सकेगा।’
और तब से नाम मैंने है लिखा ऐसे
कि, सचमुच, सिंधु की लहरें न उसको पाएँगी,
फूल में सौरभ, तुम्हारा नाम मेरे गीत में है।
विश्व में यह गीत फैलेगा
अजन्मी पीढ़ियाँ सुख से
तुम्हारे नाम को दुहराएँगी।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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