हरिद्वार हरि का द्वार!

फिलहाल हरिद्वार में हूँ| कई बार सोचा है कि हरिद्वार में आकर कुछ समय रहूँ, इस धर्मनगरी, मोक्ष प्रदायिनी माँ गंगा, हर की पैड़ी, जहां लाखों तीर्थयात्री आते हैं और मरने के बाद तो अधिकांश हिन्दू, राख के रूप में प्रवाहित होने आते हैं, जिनके बच्चे उनके लिए ऐसा करते हैं|

लेकिन धर्म नगरी भी कुछ लोगों के लिए तो कमाई की नगरी ही है, जैसे मैं यहाँ गंगा दशहरा के दिन पहुंचा, ऐसे में सभी होटलों के किराये कम से कम दो गुने हो गए थे| छोटे-छोटे कमरों का किराया ढाई-तीन-चार हजार रुपए प्रतिदिन, जिसका शहर के मानक, प्रदान की गई सुविधाओं से कोई तालमेल नहीं है|

खैर हरिद्वार के बारे में जब मैं सोचता हूँ तब अन्य विषयों के अलावा यह भी विचार आता है कि पतंजलि योगपीठ तथा बाबा रामदेव द्वारा वहाँ विकसित की गई योग एवं चिकित्सा संबंधी सुविधाओं के बारे में लिखा जाए|

देश में योग सिखाने वाले तो लंबे समय से रहे हैं लेकिन बाबा रामदेव ऐसे पहले व्यक्ति या संत हैं जिन्होंने योग के परिणामों को जांच और अनुसंधान के माध्यम से एक प्रामाणिक स्वरूप प्रदान किया, इसे विश्व भर में लोकप्रिय बनाया और फिर ऐसे अनेक उत्पाद तैयार किए जो स्वास्थ्य और सौन्दर्य की दृष्टि से उपयोगी होने के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडस को जोरदार टक्कर दे रहे हैं ऐसे में अपने ही देश के कुछ बुद्धिजीवी आपत्ति करते हैं कि एक संत व्यवसायी कैसे बन गया, लेकिन मैं समझता हूँ कि बाबा रामदेव द्वारा इन सभी क्षेत्रों में किया गया कार्य अत्यंत श्रेष्ठ और देशहित में बहुत उपयोगी है|

मेरे मन में कई बार विचार आता है कि बाबा रामदेव द्वारा हरिद्वार में विकसित की गई सुविधाओं का अवलोकन करके उनके बारे में लिखूँ| यह भी संभव है कि कोई व्यक्ति कैसे धीरे-धीरे बाबा रांमदेव के रूप में विकसित हुआ, इस बारे में, एक भक्त के रूप में नहीं, एक सजग और निष्पक्ष प्रेक्षक की दृष्टि से विचार करते हुए एक पुस्तक लिख सकता हूँ|
हरिद्वार में वैसे तो बहुत से संत महात्मा होंगे जिनके पास ज्ञान का अक्षय भंडार होगा, लेकिन एक व्यक्ति स्वामी अवधेशानंद जी ऐसे हैं जिनके उपदेशों को, उनके व्याख्यानों को सुनकर मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है| कई बार ऐसा भी मन होता है कि उनको निकट से जानकर उनके बारे में पुस्तक लिखी जाए|

लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि मैं अब गोवा में रहता हूँ और ये सब कार्य करने के लिए यहाँ लंबे समय तक रहने की आवश्यकता होगी| ऐसे में यही विचार आता है कि यदि यहाँ रहने की सुविधा मिल जाए तो इस प्रकार का कोई उल्लेखनीय और सार्थक कार्य शायद हो पाए|
फिलहाल तो लगता है कि इस प्रकार का विचार मन में रखते हुए एक बार फिर से वापस लौटना होगा, हाँ कुछ समय तो यहाँ संभावनाओं के बारे में विचार करूंगा|

आज के लिए इतना ही|
नमस्कार|

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4 responses to “हरिद्वार हरि का द्वार!”

  1. बहुत ही नेक ख्याल है। आप आश्र्म की शरण ले सकते हैं।

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      धन्यवाद जी।

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Thanks a lot ji.

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