आज हम थोड़े पुराने ज़माने में चलते हैं| जी हाँ अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ तक कविता-शायरी की दुनिया में सक्रिय रहे ज़नाब नज़ीर अकबराबादी जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में शायर ने अपनी समधिन के सौन्दर्य का बड़ा रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है|
लीजिए प्रस्तुत है ज़नाब नज़ीर अकबराबादी जी की यह कविता –

सरापा हुस्ने-समधिन गोया गुलशन की क्यारी है,
परी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधिन से हारी है|
खिंची कंघी गुँथी चोटी जमी पट्टी लगा काजल,
कमाँ अब्रू नज़र जादू निगाह हर एक दुलारी है|
जबीं महताब आँखें शोख़ शीरीं लब गोहर[5]-दन्दाँ,
बदन मोती दहन गुंचा अदा हँसने की प्यारी है|
नया किमख़्वाब का लहँगा झमकते ताश की अँगिया,
कुचें तसवीर-सी जिन पर लगा गोटा किनारी है|
मुलायम पेट मख़मल-सा कली-सी नाफ़की सूरत,
उठा सीना सफ़ा पेडू अजब जोबन की नारी है|
लटकती चाल मदमाता चले बिच्छू[8] को झनकाती,
अदा में दिल लिए जाती अजब समधिन हमारी है|
भरे जोबन पै इतराती झमक अँगिया की दिखलाती,
कमर लहँगे से बल खाती लटक घूँघट की भारी है|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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