रोज़ ही मंझदार हो ऐसा नहीं होता!

हरेक कश्ती का अपना तज़ुर्बा होता है दरिया में,
सफर में रोज़ ही मंझदार हो ऐसा नहीं होता|

निदा फ़ाज़ली

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