शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की!

क़ौस इक रंग की होती है तुलू
एक ही चाल भी पैमाने की,
गोशे-गोशे में खड़ी है मस्जिद
शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की|

कैफ़ी आज़मी

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