कौन रखता है मज़ारों का हिसाब!

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत
न कहीं धूप न साया न सराब,
कितने अरमान हैं किस सहरा में
कौन रखता है मज़ारों का हिसाब|

कैफ़ी आज़मी

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