मुझसे इक नज़्म का वादा है!

आज गुलज़ार साहब की एक लोकप्रिय नज़्म शेयर कर रहा हूँ, शायद आपने पहले भी सुनी होगी| गुलज़ार साहब का परिचय देने की तो शायद जरूरत ही नहीं है| लीजिए प्रस्तुत है यह नज़्म-

मुझसे इक नज़्म का वादा है,
मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में,
जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद,
उफ़क़ पर पहुंचे
दिन अभी पानी में हो,
रात किनारे के क़रीब
न अँधेरा, न उजाला हो,
यह न रात, न दिन

ज़िस्म जब ख़त्म हो
और रूह को जब सांस आए

मुझसे इक नज़्म का वादा है मिलेगी मुझको

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|

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2 responses to “मुझसे इक नज़्म का वादा है!”

  1. बहुत सुन्दर |

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

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