लहरों का निमंत्रण!

एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी की एक लंबी कविता का अंश शेयर कर रहा हूँ| सीनियर बच्चन जी, हाँ यही कहना होगा क्योंकि उनके सुपुत्र आज सदी के महानायक हैं| अपने समय के प्रमुख हिन्दी कवियों में हरिवंश राय बच्चन जी शामिल थे उनके गीतों पर श्रोतागण झूम-झूम जाते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी की लंबी कविता का यह अंश–


तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !

:1:
रात का अंतिम प्रहर है,
झिलमिलाते हैं सितारे ,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे
मैं खड़ा सागर किनारे,
वेग से बहता प्रभंजन
केश पट मेरे उड़ाता,
शून्य में भरता उदधि –
उर की रहस्यमयी पुकारें;
इन पुकारों की प्रतिध्वनि
हो रही मेरे ह्रदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर
सिंधु का हिल्लोल कंपन .
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !


:2:

विश्व की संपूर्ण पीड़ा
सम्मिलित हो रो रही है,
शुष्क पृथ्वी आंसुओं से
पाँव अपने धो रही है,
इस धरा पर जो बसी दुनिया
यही अनुरूप उनके–
इस व्यथा से हो न विचलित
नींद सुख की सो रही है;
क्यों धरनि अबतक न गलकर
लीन जलनिधि में हो गई हो ?
देखते क्यों नेत्र कवि के
भूमि पर जड़-तुल्य जीवन ?
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !

:3:

जर जगत में वास कर भी
जर नहीं ब्यबहार कवि का,
भावनाओं से विनिर्मित
और ही संसार कवि का,
बूँद से उच्छ्वास को भी
अनसुनी करता नहीं वह
किस तरह होती उपेक्षा –
पात्र पारावार कवि का ,
विश्व- पीड़ा से , सुपरिचित
हो तरल बनने, पिघलने ,
त्याग कर आया यहाँ कवि
स्वप्न-लोकों के प्रलोभन .
तीर पर कैसे रुकूं मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !


:4:

जिस तरह मरू के ह्रदय में
है कहीं लहरा रहा सर ,
जिस तरह पावस- पवन में
है पपीहे का छुपा स्वर ,
जिस तरह से अश्रु- आहों से
भरी कवि की निशा में
नींद की परियां बनातीं
कल्पना का लोक सुखकर,
सिंधु के इस तीव्र हाहा-
कार ने , विश्वास मेरा ,
है छिपा रक्खा कहीं पर
एक रस-परिपूर्ण गायन.
तीर पर कैसे रुकूं मैं
आज लहरों में निमंत्रण !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “लहरों का निमंत्रण!”

  1. बहुत सुंदर कविता

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

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  2. बहुत ही खूबसूरत कविता, ❤

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

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