आज शैलेन्द्र जी का लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ| शैलेन्द्र जी मेरे अत्यंत प्रिय फिल्मी गीतकार हैं, जिनको मैं फिल्मों का जनकवि भी कहता हूँ| आज का यह गीत 1961 में रिलीज हुई फिल्म- ‘ससुराल’ कि लिए लिखा गया था और इसको शंकर जयकिशन की जोड़ी के संगीत निर्देशन में, मुकेश जी और लता जी ने बड़े खूबसूरत अंदाज में गाया है|
लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल:

अपनी उल्फ़त पे ज़माने का न पहरा होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता|
प्यार की रात का कोई न सवेरा होता
तो कितना अच्छा होता|
पास रहकर भी बहुत दूर बहुत दूर रहे,
एक बन्धन में बँधे फिर भी तो मज़बूर रहे,
मेरी राहों में न उलझन का अँधेरा होता,
तो कितना अच्छा होता|
दिल मिले, आँख मिली, प्यार न मिलने पाए,
बाग़बाँ कहता है दो फूल न खिलने पाएँ,
अपनी मंज़िल को जो काँटों ने न घेरा होता,
तो कितना अच्छा होता|
अजब सुलगती हुई लकड़ियाँ हैं जग वाले,
मिलें तो आग उगल दें, कटें तो धुआँ करें
अपनी दुनिया में भी सुख चैन का फेरा होता
तो कितना अच्छा होता|
अपनी उल्फ़त पे …
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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