एक बार फिर से मैं आज अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक सुंदर नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नवगीत का नया संस्कार रंजक जी के गीतों में बखूबी प्रदर्शित होता है, वे कितनी खूबसूरती से जीवन की विसंगतियों को चित्रित करते हैं, मैंने पहले भी उनके अनेक नवगीत शेयर किए हैं!
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत–

अजगर के पाँव दिए जीवन को
और समय को डैने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?
लहरों की भीड़ मुझे धकिया कर
जा लगी किनारे
झूलता रहा मेरा तिनकापन
भाग्य के सहारे
कुन्दन विश्वासों ने चुभो दिए
अनगिन नश्तर पैने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?
शीशे का बाल हो गई टूटन
बिम्ब लड़खड़ाए
रोशनी अँधेरे से कितने दिन
और मार खाए ?
पूछा है झुँझला कर राहों से
पाँवों के बरवै ने
ऐसा क्या पाप किया था मैंने ?
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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