बनकर सुक़रात, बरतता हूँ!

इक ज़हर के दरिया को दिन-रात बरतता हूँ ।
हर साँस को मैं, बनकर सुक़रात, बरतता हूँ ।

राजेश रेड्डी

2 responses to “बनकर सुक़रात, बरतता हूँ!”

  1. सुन्दर लाइन |

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      हार्दिक धन्यवाद जी।

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