एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे!

वसीम बरेलवी साहब उर्दू शायरी का एक जाना-माना नाम हैं और अनेक खूबसूरत ग़ज़लें, नज़्में उन्होंने हमे दी हैं| वैसे तो दूरदर्शन आदि पर अनेक मुशायरों और कवि सम्मेलनों में उनको सुना है, एक बार मैंने अपने आयोजन में, ऊंचाहार में आयोजित कवि-सम्मेलन में उनको बुलाया था और जी भरकर उनको सुना था|

लीजिए आज प्रस्तुत है वसीम बरेलवी साहब की यह ग़ज़ल –


अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएं कैसे,
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएं कैसे|

घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है,
पहले ये तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे|

लाख तलवारें बढ़ी आती हों गर्दन की तरफ़,
सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएं कैसे|

क़हक़हा आंख का बरताव बदल देता है,
हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आएँ कैसे|

फूल से रंग जुदा होना कोई खेल नहीं,
अपनी मिट्टी को कहीं छोड़ के जाएं कैसे|

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा,
एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे|

जिस ने दानिश्ता किया हो नज़र-अंदाज़ ‘वसीम’,
उस को कुछ याद दिलाएं तो दिलाएं कैसे|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “एक क़तरे को समुंदर नज़र आएं कैसे!”

  1. सुन्दर ग़ज़ल |

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      बहुत बहुत धन्यवाद जी।

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