एक बार फिर से आज मैं, अपने समय के प्रमुख गीत कवियों में शामिल और कवि सम्मेलनों में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में कुछ उदाहरण देकर यह बताया गया है इंसान को कैसा होना चाहिए, वास्तव में हम सीखना चाहें तो जीवन में किसी से भी सीख सकते हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत-

मैंने तोड़ा फूल, किसी ने कहा-
फूल की तरह जियो औ मरो
सदा इंसान ।
भूलकर वसुधा का शृंगार,
सेज पर सोया जब संसार,
दीप कुछ कहे बिना ही जला-
रातभर तम पी-पीकर पला-
दीप को देख, भर गए नयन
उसी क्षण-
बुझा दिया जब दीप, किसी ने कहा
दीप की तरह जलो, तम हरो
सदा इंसान ।
रात से कहने मन की बात,
चँद्रमा जागा सारी रात,
भूमि की सूनी डगर निहार,
डाल आँसू चुपके दो-चार
डूबने लगे नखत बेहाल
उसी क्षण-
छिपा गगन में चाँद, किसी ने कहा-
चाँद की तरह, जलन तुम हरो
सदा इंसान।
साँस-सी दुर्बल लहरें देख,
पवन ने लिखा जलद को लेख,
पपीहा की प्यासी आवाज़,
हिलाने लगी इंद्र का राज,
धरा का कण्ठ सींचने हेतु
उसी क्षण –
बरसे झुक-झुक मेघ, किसी ने कहा-
मेघ की तरह प्यास तुम हरो
सदा इंसान ।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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