मेरे अत्यंत प्रिय कवि और हमेशा बड़े भाई की तरह स्नेह से मिलने वाले, श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ|
किशन सरोज जी को सुनना एक अलग ही तरह का दिव्य अनुभव प्रदान करता था, प्रेम के प्रति पूर्णतः समर्पित और अनोखी अनुभूतियों से हमारा साक्षात्कार कराने वाले किशन जी एक महान व्यक्ति और रचनाकार थे|
लीजिए प्रस्तुत है किशन सरोज जी का लिखा यह अलग किस्म का गीत–

बिखरे रंग, तूलिकाओं से
बना न चित्र हवाओं का
इन्द्रधनुष तक उड़कर पहुंचा
सोंधा इत्र हवाओं का|
जितना पास रहा जो, उसको
उतना ही बिखराव मिला
चक्रवात-सा फिरा भटकता
बनकर मित्र हवाओं का|
कभी गर्म लू बनीं जेठ की
कभी श्रावनी पुरवाई
फूल देखते रहे ठगे-से
ढंग विचित्र हवाओं का|
परिक्रमा वेदी की करते
हल्दी लगे पांव कांपे
जल भर आया कहीं दॄगों में
धुँआ पवित्र हवाओं का|
कभी प्यार से माथा चूमा
कभी रूठ कर दूर हटीं
भोला बादल समझ न पाया
त्रिया–चरित्र हवाओं का|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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