आज मैं स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ | निदा फ़ाज़ली साहब की शायरी में एक सधुक्कड़ी अंदाज़ देखने को मिलता है| मैंने पहले भी निदा साहब की बहुत सी रचनाएं शेयर की हैं, क्या ग़ज़ब की शायरी और दोहे हैं निदा साहब के-

‘मैं रोया परदेस में, भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार’,
‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए’,
‘दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है, सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला’,
मैं इस प्रकार सैंकड़ों उदाहरण दे सकता हूँ लेकिन फिलहाल एक ही और दूंगा
‘दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है’|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय निदा फ़ाज़ली साहब की यह ग़ज़ल –
हम हैं कुछ अपने लिए कुछ हैं ज़माने के लिए,
घर से बाहर की फ़ज़ा हँसने-हँसाने के लिए|
यूँ लुटाते न फिरो मोतियों वाले मौसम,
ये नगीने तो हैं रातों को सजाने के लिए|
अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदाद-ए-सफ़र,
हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए|
मेज़ पर ताश के पत्तों-सी सजी है दुनिया,
कोई खोने के लिए है कोई पाने के लिए|
तुमसे छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था,
तुमको ही याद किया तुमको भुलाने के लिए|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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