जितने दूर हुए तुम हमसे!

आज फिर से एक बार मैं अपने अत्यंत प्रिय कवियों में से एक स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूं| रमेश रंजक जी की अनेक रचनाएं मुझे बहुत प्रिय रही हैं और उनसे मुझे बहुत प्रेरणा मिलती थी|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत-

जितने दूर हुए तुम हमसे
उतने पास हुए
दर्द गीत बन गया
जिस घड़ी प्राण उदास हुए|

याद किसी ज़िद्‍दी बालक-सी
पकड़ एक उँगली
उगी जिस तरह प्रीत उसी
आँगन की ओर चली
भर-भर आई आँख ब्याज से
पाँच-पचास हुए|

सुबह तुम्हारे ही सुहाग की
साड़ी में आई
जाते-जाते शाम तुम्हारे
ढंग से शरमाई
सुधि की गन्ध मिली, पतझर के
दिन मधुमास हुए|

रात झुकी तुलसी-चौरे पर
दिन के पूजन को
ऐसा लगा कि जैसे तुमने
परस दिया मन को
युग-युग के भूले-बिसरे
दो नाम समास हुए|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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