समय की शिला पर मधुर चित्र कितने!

आज हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि और नवगीत आंदोलन के प्रणेता स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इत्तेफाक से मैं कभी उनके कभी दर्शन नहीं कर पाया लेकिन किसी रचनाकार से असली जुड़ाव तो उसकी रचनाओं के माध्यम से ही होता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह गीत-

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए।

किसी ने लिखी आंसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूंद पानी
इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी के
गई घुल जवानी, गई मिट निशानी।
विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाए, गगन ने गिराए।

शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?
प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाए, विरह ने बुझाए।

भटकती हुई राह में वंचना की
रुकी श्रांत हो जब लहर चेतना की
तिमिर-आवरण ज्योति का वर बना तब
कि टूटी तभी श्रृंखला साधना की।
नयन-प्राण में रूप के स्वप्न कितने
निशा ने जगाए, उषा ने सुलाए।

सुरभि की अनिल-पंख पर मोर भाषा
उड़ी, वंदना की जगी सुप्त आशा
तुहिन-बिन्दु बनकर बिखर पर गए स्वर
नहीं बुझ सकी अर्चना की पिपासा।
किसी के चरण पर वरण-फूल कितने
लता ने चढ़ाए, लहर ने बहाए।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार |

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