ओ शतरूपा !

एक बार फिर से आज मैं स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| कुमार शिव जी की पंक्तियाँ जो मुझे हमेशा याद रहती हैं, वे हैं- ‘काले कपड़े पहने हुए सुबह देखी, देखी हमने अपनी सालगिरह देखी’ और ‘फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में, रोशनी को शहर से निकाला गया’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह सुंदर विरह गीत –



साँझ सकारे
अस्त, सूर्य के साथ हुए हम
बिना तुम्हारे
ओ शतरूपा !

ऐसे बिछुड़े
पुनर्मिलन फिर सम्भव कभी
नहीं हो पाया
यादों के जंगल में
किए रतजगे
कोई भोर न आया

नदी किनारे
लहरें देखीं, नयन हुए नम
बिना तुम्हारे
ओ शतरूपा !


कितने दिन बीते
जब हम पर
हरसिंगार के फूल झरे थे
बारिश में भीगे थे
बाँहों में हमने
कचनार भरे थे

आँसू खारे
ढूँढ़ रहे हैं अपना उदगम
बिना तुम्हारे
ओ शतरूपा !



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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