अपनी ग़ज़लों में एक खास तरह का ‘पंच’ लेकर आने वाले स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| राहत जी अक्सर अपने श्रोताओं को चौंका देते थे, ऐसी कोई बात अपनी शायरी में लेकर आते थे|
लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की यह ग़ज़ल-

वफ़ा को आज़माना चाहिए था, हमारा दिल दुखाना चाहिए था,
आना न आना मेरी है मर्ज़ी, मगर तुमको बुलाना चाहिए था|
हमारी ख्वाहिश एक घर की थी, उसे सारा ज़माना चाहिए था,
मेरी आँखें कहाँ जी नम हुई थीं, समुन्दर को बहाना चाहिए था|
जहाँ पर पंहुचना मैं चाहता हूँ, वहां पे पंहुच जाना चाहिए था,
हमारा ज़ख्म पुराना बहुत है, चारागर भी पुराना चाहिए था|
मुझसे पहले वो किसी और की थी, मगर कुछ शायराना चाहिए था,
चलो माना ये छोटी बात है, पर तुम्हें सब कुछ बताना चाहिए था|
तेरा भी शहर में कोई नहीं था, मुझे भी एक ठिकाना चाहिए था,
कि किसको किस तरह से भूलते हैं, तुम्हें मुझको सिखाना चाहिए था|
ऐसा लगता है लहू में हमको, कलम को भी डुबाना चाहिए था,
तू मेरे साथ रहकर तंज़ ना कर, तुझे जाना था जाना चाहिए था|
क्या बस मैंने ही की है बेवफाई,जो भी सच है बताना चाहिए था,
मेरी बर्बादी पे वो यह चाहता है, मुझे भी मुस्कुराना चाहिए था|
बस एक तू ही मेरे साथ में है, तुझे भी रूठ जाना चाहिए था,
हमारे पास जो ये फन है मियां, हमें इससे कमाना चाहिए था|
अब ये ताज किस काम का है, हमें सर को बचाना चाहिए था,
उसी को याद रखा उम्र भर कि, जिसको भूल जाना चाहिए था|
मुझे बातें भी करनी थी उससे, गले से भी लगाना चाहिए था,
उसने प्यार से जब था बुलाया, हमें मर के भी जाना चाहिए था|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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