स्वर्गीय भारत भूषण जी हिन्दी काव्य मंचों के ऐसे दिव्य हस्ताक्षर थे कि जिनकी उपस्थिति काव्य मंच को गरिमा प्रदान करती थी| उनके अनेक गीत मैंने पहले शेयर की हैं
‘मैं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना क्या मुरझाना’,
‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी बाबा कबीर को रुला गई’,
आधी उम्र करके धुआँ ये तो कहो किसके हुए‘|

भारत भूषण जी का जो गीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ वह अपने आप में अलग तरह का गीत है|
लीजिए आज प्रस्तुत है, भारत भूषण जी का यह गीत –
ये असंगति जिन्दगी के द्वार सौ-सौ बार रोई
बांह में है और कोई चाह में है और कोई|
साँप के आलिंगनों में
मौन चन्दन तन पड़े हैं
सेज के सपनो भरे कुछ
फूल मुर्दों पर चढ़े हैं,
ये विषमता भावना ने सिसकियाँ भरते समोई
देह में है और कोई, नेह में है और कोई|
स्वप्न के शव पर खड़े हो
मांग भरती हैं प्रथाएं
कंगनों से तोड़ हीरा
खा रहीं कितनी व्यथाएं,
ये कथाएं उग रही हैं नागफन जैसी अबोई
सृष्टि में है और कोई, दृष्टि में है और कोई|
जो समर्पण ही नहीं हैं
वे समर्पण भी हुए हैं
देह सब जूठी पड़ी है
प्राण फिर भी अनछुए हैं,
ये विकलता हर अधर ने कंठ के नीचे सँजोई
हास में है और कोई, प्यास में है और कोई|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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