क्यों विष जान पिया करता है!

आज मैं स्वर्गीय बलबीर सिंह जी ‘रंग’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| ‘रंग’ जी अपनी अलग प्रकार की अभिव्यक्ति शैली के लिए जाने जाते थे| इस गीत में ‘रंग’ जी ने अपने अंदाज़ में यह कहा है कि कवि गीत क्यों लिखता है|

बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की बहुत लोकप्रिय पंक्तियाँ जो मैं अक्सर दोहराता हूँ, वे हैं

आब-ओ-दाना रहे, रहे ना रहे
ये ज़माना रहे, रहे ना रहे,
तेरी महफिल रहे सलामत यार,
आना-जाना रहे, रहे ना रहे।

हमने गुलशन की खैर मांगी है,
आशियाना रहे, रहे ना रहे।


लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का यह गीत –

कवि क्यों गीत लिखा करता है?
कवि ने गीतों में क्या देखा,
दुःख की छाया, सुख की रेखा;
वरदानों की झोली ले,
वह क्यों अभिशाप लिया करता है?

याद उसे क्यों गा कर रोना,
ज्ञात उसे क्यों पा कर खोना;
मस्ती में अमृत ठुकरा कर,
क्यों विष जान पिया करता है?

जग कवि के गीतों में डूबा,
कवि जग आघातों से ऊबा;
ढाल लगा कर गीतों की वह,
जग आघात सहा करता है।


जब जग कवि में संशय पाता,
तब वह अंतस चीर दिखाता;
फिर वह गीत सूत्र से अपने,
उर के घाव सिया करता है।

गीतों में कुछ दुख चुक जाता,
वेग वेदना का रुक जाता;
वरना वह पीड़ा के तम से,
दिन की रात किया करता है।

माना मन के गीत न कवि के;
किन्तु निरर्थक गीत न कवि के;
गीतों को वह मीत बनाकर,
युग-युग तलक जिया करता है।
कवि क्यों गीत लिखा करता है?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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