स्वर्गीय डॉक्टर कुंवर बेचैन जी मेरे अग्रज और गुरु तुल्य रहे हैं| उनसे अनेक बार मिलने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ था| बहुत सहज और सरल हृदय इंसान और सृजनशील गीतकार थे|
लीजिए आज प्रस्तुत है डॉक्टर कुंवर बेचैन जी की एक –

दो चार बार हम जो कभी हँस-हँसा लिए,
सारे जहां ने हाथ में पत्थर उठा लिए|
रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर,
अच्छा किया जो आपने सपने चुरा लिए|
चाहा था एक फूल ने तड़पे उसी के पास,
हमने खुशी के पाँवों में काँटे चुभा लिए|
सुख, जैसे बादलों में नहाती हों बिजलियाँ,
दुख, बिजलियों की आग में बादल नहा लिए|
जब हो सकी न बात तो हमने यही किया,
अपनी ग़ज़ल के शेर कहीं गुनगुना लिए|
अब भी किसी दराज में मिल जाएँगे तुम्हें,
वो खत जो तुम्हें दे न सके लिख लिखा लिए।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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