स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी अपने समय में हिन्दी काव्य मंच के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे, जिन लोगों को गीत पढ़ने और सुनने का शौक है उनको हमेशा अवस्थी जी के नए गीत सुनने की भी लालसा रहती थी| अवस्थी जी के अनेक गीत मुझे प्रिय रहे हैं और मैंने शेयर भी किए हैं, जैसे एक है ‘सो न सका मैं, याद तुम्हारी आई सारी रात, और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात‘, ‘चाहे मकान का हो, चाहे मसान का हो, धुएं का रंग एक है‘ आदि|
लीजिए आज प्रस्तुत है रमानाथ अवस्थी जी का एक और लोकप्रिय गीत, जिसमें उन्होंने अपने अनूठे अंदाज़ में अभिव्यक्ति की है-

ऐसा कहीं होता नहीं
ऐसा कभी होगा नहीं।
धरती जले बरसे न घन,
सुलगे चिता झुलसे न तन।
औ ज़िंदगी में हों न ग़म।
ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।
हर नींद हो सपनों भरी,
डूबे न यौवन की तरी,
हरदम जिए हर आदमी,
उसमें न हो कोई कमी।
ऐसा कभी होगा नहीं,
ऐसा कभी होता नहीं।
सूरज सुबह आए नहीं,
औ शाम को जाए नहीं।
तट को न दे चुम्बन लहर
औ मृत्यु को मिल जाए स्वर।
ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।
दुख के बिना जीवन कटे,
सुख से किसी का मन हटे।
पर्वत गिरे टूटे न कन,
औ प्यार बिन जी जाए मन।
ऐसा कभी होगा नहीं
ऐसा कभी होता नहीं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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