समय के विष बुझे नाखून!

सोम ठाकुर जी मेरे प्रिय हिन्दी कवियों में से एक हैं, मेरा सौभाग्य है कि एक श्रोता और एक आयोजक के रूप में भी मुझे उनसे अनेक बार मिलने का अवसर प्राप्त हुआ और मैंने उनके बहुत से गीत पहले भी शेयर किए हैं, राष्ट्र प्रेम, भाषा प्रेम, विशुद्ध प्रेम, कौन सा क्षेत्र है जिसमें सोम जी ने लाज़वाब गीत और ग़ज़लों की सौगात नहीं दी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है सोम ठाकुर जी का एक गीत जिसमें आज के जीवन में फैलते वैमनस्य के विष को उजागर किया गया है-


हवाए संदली हैं
हम बचें कैसे?
समय के विष बुझे
नाख़ून बढ़ते हैं

देखती आँखें छलक कर
रक्त का आकाश दहका-सा
महमहाते फागुनो में झूलकर भी
रह गया दिन बिना महका सा
पाँव बच्चों के
मदरसे की सहमती सीढ़ियों पर
बड़े डर के साथ चढ़ते हैं

स्वप्नवंशी चितवनों को दी विदा
स्वागत किया टेढ़ी निगाहों का
सहारा छीन लेते हैं पहरूए खुद
उनींदे गाँव की कमज़ोर बाहों का

ज़रा जाने-
भला ये कौन है जो
आदमी की खाल से
हर साज़ मढ़ते हैं?
समय के विष बुझे नाख़ून
बढ़ते है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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