आज मैं एक बार फिर सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| वैसे तो ग़ज़ल लिखने वाले बहुत सारे हैं, लेकिन कुछ होते हैं जो अपने अलग किस्म के मुहावरे, अभिव्यक्ति के सौन्दर्य के कारण पहचाने जाते हैं, सूर्यभानु गुप्त जी भी उनमें शामिल हैं| उनके कुछ शेर जो मुझे अक्सर याद आते हैं, वे हैं-

जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं,
नदी में बांध के पत्थर उतर गया हूँ मैं|
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पहाड़ों के क़दों की खाइयां हैं,
बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं|
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धीरे-धीरे हर बस्ती का, प्रचलन बदला शहर हुआ,
सूट-बूट हर वन मानुष ने, धीरे-धीरे डांट लिए|
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लीजिए आज प्रस्तुत है सूर्यभानु गुप्त जी की यह ग़ज़ल-
सुबह लगे यूँ प्यारा दिन,
जैसे नाम तुम्हारा दिन|
पाला हुआ कबूतर है,
उड़, लौटे दोबारा दिन|
दुनिया की हर चीज़ बही,
चढ़ी नदी का धारा दिन|
कमरे तक एहसास रहा,
हुआ सड़क पर नारा दिन|
थर्मामीटर कानों के,
आवाज़ों का पारा दिन|
पेड़ों जैसे लोग कटे,
गुज़रा आरा-आरा दिन|
उम्मीदों ने टाई-सा,
देखी शाम, उतारा दिन|
चेहरा-चेहरा राम-भजन,
जोगी का इकतारा दिन|
रिश्ते आकर लौट गए,
हम-सा रहा कुँवारा दिन|
बाँधे बँधा न दुनिया के,
जन्मों का बंजारा दिन|
अक़्लमंद को काफ़ी है,
साहब! एक इशारा दिन|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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