वसीम बरेलवी साहब आज के एक मशहूर शायर हैं जो अपने सहज भाव से कही गए, गहराई से भरे शेरों से जनता को बांध लेते हैं| मैंने भी अपने संस्थान के लिए किए गए आयोजनों में दो बार उनको आमंत्रित किया था|
लीजिए आज प्रस्तुत है, जनाब वसीम बरेलवी साहब की यह ग़ज़ल–

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते,
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते|
मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है,
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते|
जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का,
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते|
ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना,
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते|
बिसात-ए-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता,
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते|
‘वसीम’ जहन बनाते हैं तो वही अख़बार,
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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