डॉ बशीर बद्र जी आज की उर्दू शायरी की पहचान बनाने वाले प्रमुख शायरों में से एक हैं। उनके कुछ शेर तो जैसे मुहावरा बन गए हैं| जैसे आज की ग़ज़ल का एक शेर भी अक्सर दोहराया जाता है- ‘मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी’|

डॉ बशीर बद्र जी उर्दू शायरी में एक्सपेरीमेंट करने के लिए भी जाने जाते हैं| लीजिए आज इस ग़ज़ल का आनंद लीजिए-
कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी ,
नए लोग होंगे नई बात होगी |
मैं हर हाल में मुस्कुराता रहूँगा,
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी |
चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना,
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी |
परेशाँ हो तुम भी परेशाँ हूँ मैं भी,
चलो मय-कदे में वहीं बात होगी|
चराग़ों की लौ से सितारों की ज़ौ तक,
तुम्हें मैं मिलूँगा जहाँ रात होगी |
जहाँ वादियों में नए फूल आए,
हमारी तुम्हारी मुलाक़ात होगी |
सदाओं को अल्फ़ाज़ मिलने न पाएँ,
न बादल घिरेंगे न बरसात होगी |
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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