एक बार फिर से आज, हिन्दी कवि सम्मेलनों को अपने सुरीले गीतों से चमत्कृत करने वाले स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

अवस्थी जी की काव्य मंचों पर अपनी एक अलग पहचान थी, मुझे आशा है कि आपको यह गीत भी अलग तरह का लगेगा-
तुम्हारी चाँदनी का क्या करूँ मैं,
अँधेरे का सफ़र मेरे लिए है|
किसी गुमनाम के दुख-सा
अजाना है सफ़र मेरा,
पहाड़ी शाम-सा तुमने
मुझे वीरान में घेरा|
तुम्हारी सेज को ही क्यों सजाऊँ,
समूचा ही शहर मेरे लिए है|
थका बादल, किसी सौदामिनी
के साथ सोता है,
मगर इंसान थकने पर
बड़ा लाचार होता है|
गगन की दामिनी का क्या करूँ मैं,
धरा की हर डगर मेरे लिए है|
किसी चौरास्ते की रात-सा
मैं सो नहीं पाता,
किसी के चाहने पर भी
किसी का हो नहीं पाता|
मधुर है प्यार, लेकिन क्या करूँ मैं,
जमाने का ज़हर मेरे लिए है|
नदी के साथ मैं, पहुँचा
किसी सागर किनारे,
गई ख़ुद डूब, मुझको
छोड़ लहरों के सहारे|
निमंत्रण दे रही लहरें करूँ क्या,
कहाँ कोई भँवर मेरे लिए है ।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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