कौवों ने खुजलाईं पांखें, कई दिनों के बाद!

बंगाल के चुनाव परिणामों को लेकर कुछ कहने का मन हो रहा है| कल देखा कि राजदीप सरदेसाई बहुत दिनों के बाद, अपनी दीदी के बंगाल चुनावों में विजयी होने के उपलक्ष्य में प्रसन्नचित्त होकर उनका इंटरव्यू ले रहे थे| बहुत दिनों के बाद ऐसा मौका आता है जब राजदीप, बरखा दत्त, रवीश कुमार, विनोद दुआ जैसे गए जमाने के लाडले पत्रकारों को अपनी खुशी ज़ाहिर करने का मौका मिलता है|

सचमुच मोदी जी ने बहुत सारे लोगों की दुकान पर ताला लगा दिया है| बहुत से नेता, जैसे – यशवंत सिन्हा, शरद यादव, अरुण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा आदि-आदि तो कुर्सी न मिलने पर यह सोचकर बाहर गए थे कि अभी विपक्ष को एक करेंगे और मोदी जी को बाहर करके फिर से कोई अच्छी सी गद्दी पा जाएंगे! कुछ नहीं हुआ, तब ऐसा कोई मौका आने से, इनको लगता है कि शायद अंतिम यात्रा से पहले इनको, कुछ समय कुर्सी मैया की गोद में सोने का मौका मिल जाए|


पता नहीं क्यों ऐसे में बाबा नागार्जुन जी की ‘अकाल के बाद’ कविता याद आती है, जिसमें बताया गया है कि अकाल के बाद जब घर में अनाज के दाने आते हैं, तब घर से जुड़े प्राणियों में कैसे फिर से जान आ जाती है, जैसे चूल्हा- चक्की से होने वाले उत्पादन के आधार पर- छिपकलियाँ, चूहे, कानी कुतिया और कौए भी, सब सक्रिय हो जाते हैं |

और यहाँ जबरन लगभग रिटायर हो चुके राजनेता और राजदीप जैसे स्तरहीन पत्रकार, जो आंदोलन के दौरान स्पष्ट रूप से दुर्घटनावश हुई मृत्यु के मामले में भी संदेह पैदा करना चाहते हैं, नए सपने देखने लगते हैं|


अभी देखा जाए तो 5 राज्यों के चुनाव में हुआ क्या है? किसने क्या खोया है? कांग्रेस लगातार अस्तित्वहीन होती जा रही है| मेरा खयाल है कि भाजपा ने हर जगह अपनी स्थिति में सुधार किया है| सबसे ज्यादा सुधार तो बंगाल में ही हुआ है, जहां भाजपा पिछली विधान सभा में 3 सीटों से बढ़कर 77 पर आ गई है| ये कितने प्रतिशत बढ़ोतरी है जी|

हाँ उन्होंने सपने कुछ ज्यादा ही ऊंचे देखे थे, तो सपने तो ऊंचे ही देखने चाहिएं ना! और इसके लिए मेहनत भी बहुत की गई, शायद इसीलिए वे इतना आगे भी बढ़ पाए| लेकिन ये महान पत्रकार और राजनेता इस बारे में तो बात ही नहीं करते कि बंगाल में कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों का क्या हुआ? कहाँ है अब उनकी दुकान?


भाजपा के हिंदुत्ववादी कट्टर समर्थकों की भाषा मुझे बिलकुल पसंद नहीं है, लेकिन शायद यह उनकी रणनीति है उनके विरुद्ध, जिनका पूरा चुनावी गणित इस बात पर निर्भर है कि एक समुदाय विशेष के वोट कहीं बंट न जाएँ, और वास्तव में यदि बंगाल में ओवैसी और कम्युनिस्ट-कांग्रेस कुछ वोट ले पाते तो शायद परिणाम वैसा ही होता, जैसा भाजपा वाले सपना देख रहे थे|


मैं ऐसा नहीं मान पाता कि जो भी सत्ता में है वो खराब है और जो सत्ता से बाहर हो गया, वो स्वतः पवित्र हो गया| मैं मानता हूँ कि सरकारों के निष्पादन का विश्लेषण, हर मामले में, गुण-दोष के आधार पर किया जाना चाहिए और इस दृष्टि से मैं मानता हूँ कि मोदी सरकार का निष्पादन पहले की सरकार के मुक़ाबले काफी अच्छा है|

एक बात और बहुत स्पष्ट है कि जहां दिल्ली में आए परिणामों के लिए कांग्रेस द्वारा की गई आत्महत्या की बहुत बड़ी भूमिका थी, वहीं बंगाल में कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों पार्टियों ने आत्महत्या करके इस परिणाम को संभव बनाया| यदि ये पार्टियाँ ऐसा ही करते रहने वाली हैं, तो भविष्य की राजनीति के निर्माण में इनकी इस शहादत की महान भूमिका होगी|


ऐसे ही मन हुआ कि हाल ही के चुनाव परिणामों पर अपनी प्रतिक्रिया दे दूँ, बाकी तो जनता मालिक है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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2 responses to “कौवों ने खुजलाईं पांखें, कई दिनों के बाद!”

  1. Appalled to see the post poll violence in WB.

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    1. shri.krishna.sharma avatar
      shri.krishna.sharma

      Very true. Not good indications.

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