शकील बदायुनी साहब भारत के एक जाने–माने शायर थे और हिन्दी फिल्मों के लिए भी उन्होंने कुछ बहुत नायाब गीत लिखे हैं| उनका एक शेर तो मुझे अक्सर याद आता है- ‘जब चला ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का शकील, मुझको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया!’

लीजिए आज प्रस्तुत है शकील साहब की यह ग़ज़ल-
सुब्ह का अफ़साना कहकर शाम से,
खेलता हूं गर्दिशे-आय्याम से|
उनकी याद उनकी तमन्ना, उनका ग़म,
कट रही है ज़िन्दगी आराम से|
इश्क़ में आएंगी वो भी साअ़तें,
काम निकलेगा दिले-नाकाम से|
लाख मैं दीवाना-ओ-रूसवा सही,
फिर भी इक निस्बत है तेरे नाम से|
सुबहे-गुलशन देखिए क्या गुल खिलाए,
कुछ हवा बदली हुई है शाम से|
हाय मेरा मातमे-तश्नालबी,
शीशा मिलकर रो रहा है जाम से|
हर नफ़स महसूस होता है ‘शकील’,
आ रहे हैं नामा-ओ-पैग़ाम से|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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