तब पता यह चला, मूलधन खो गया!

आज एक बार फिर से आज मैं हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रसिद्ध हस्ताक्षर, स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय त्यागी जी जुझारूपन की कविता के लिए जाने जाते थे और एक अलग तरह की छाप उनकी कविताओं की पड़ती थी|

लीजिए प्रस्तुत है यह सुंदर गीत कविता –

तन बचाने चले थे कि मन खो गया,
एक मिट्टी के पीछे रतन खो गया|

घर वही, तुम वही, मैं वही, सब वही,
और सब कुछ है वातावरण खो गया|

यह शहर पा लिया, वह शहर पा लिया,
गाँव को जो दिया था वचन खो गया|

जो हज़ारों चमन से महकदार था,
क्या किसी से कहें वह सुमन खो गया|


दोस्ती का सभी ब्याज़ जब खा चुके,
तब पता यह चला, मूलधन खो गया|

यह जमीं तो कभी भी हमारी न थी,
यह हमारा तुम्हारा गगन खो गया|

हमने पढ़कर जिसे प्यार सीखा कभी,
एक गलती से वह व्याकरण खो गया|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|


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