109. एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया!

आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

हाँ यह पुरानी पोस्ट शेयर करने से पहले, मैं सभी साथियों को अपने प्यारे भारतवर्ष के स्वाधीनता दिवस की हार्दिक बधाई देता हूँ।

आज सुदर्शन फाकिर जी की एक गज़ल के बहाने से बात करते हैं, जिसको जगजीत सिंह जी ने बड़े सुंदर तरीके से गाया है। चलिए पहले यह गज़ल देख लेते हैं-

शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया,
क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया।

ता उम्र ढूंढ़ता रहा मंज़िल मैं इश्क की,
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफर ले के आ गया।

नश्तर है मेरे हाथ में, कांधे पे मैकदा,
लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिगर ले के आ गया।

फाकिर सनम कदे में मैं, आता न लौटकर,
एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया।

ये वास्तव में कुछ ऐसी दुनिया है, जिसके बारे में नीरज जी ने भी कहा है-

मगर प्यार को खोजने जो चला वो
न तन ले के लौटा, न मन ले के लौटा।

और क्या दिव्य इलाज बताया है इस गज़ल में, दर्द-ए-जिगर का- हाथों में नश्तर (चाकू) और कंधे पर मैखाना!
और अंतिम शेर में तो कितनी सादगी से शायर महोदय ने अपने आपको प्रस्तुत किया है-

एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया।

जिस प्रकार जब लोग लंबी मैराथन दौड़ में दौड़ते हैं, तब बीच-बीच में लोग पानी वगैरा लेकर खड़े रहते हैं, जिससे उनको थकान से राहत मिलती रहे। इसी प्रकार ज़िंदगी में, इश्क़ की मैराथन में जो दौड़ रहे हैं, और उनका हासिल-ए-सफर, दिल पर लगे ज़ख्म ही हैं, उनके जीवन-पथ पर भी शायद इस प्रकार के ज़ख्म प्रदान करने वाले सेवा-केंद्र बने रहने ज़रूरी हैं, जिससे उनको यह एहसास बना रहे कि वे सफर में हैं-

आबाद नहीं, बरबाद नहीं
गाता हूँ खुशी के गीत मगर
ज़ख्मों से भरा सीना है मेरा
हंसती है मगर ये मस्त नज़र।

नमस्कार।
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2 responses to “109. एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया!”

  1. superiorafzal avatar
    superiorafzal

    Happy independence day

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    1. धन्यवाद,आपको भी स्वाधीनता दिवस की हार्दिक बधाई।

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