209. हाफ़िज खुदा तुम्हारा!

कल मैंने एक पुराना गीत शेयर किया था, जिसे मेरे एक पुराने मित्र और सहकर्मी गाया करते थे। आज फिर से एक पुराना गीत शेयर कर रहा हूँ, इसे भी मेरे वही मित्र गाते थे।

इस गीत को शेयर करते समय एक बात याद आ रही है, बच्चों में संगीत के टेलेंट को लेकर जो शो चलते हैं, उनमें अक्सर गायक, संगीतकार लोग मेंटर के रूप में अपनी टीम बना लेते हैं। ऐसे ही एक ‘शो’ में मुझे याद आ रहा है कि हिमेश रेशमिया ने अपनी टीम के एक सिंगर के बारे में बात करते हुए कहा था- ‘मुझे इसके घर में रोटी चाहिए’। बेशक अगर कोई अच्छा गायक बनकर मार्केट में चल भी जाए, तो वह भरपूर कमा सकता है।

इस गीत की बात करते हुए मुझे ‘रोटी’ का यह किस्सा अचानक इसलिए याद आ गया कि, यह गीत तो बहुत अच्छा है ही, लेकिन जब मैं युवा था, पढ़ाई और नौकरी के लिए ट्रेन से यात्रा करता था, तब ट्रेन में भिक्षा मांगने वाले अक्सर इस गीत को गाया करते थे। तो यह गीत, जैसे भी हो, उनको रोटी भी देता था।

खैर, यह गीत है 1956 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘शीरीं-फरहाद’ का, इस गीत को तनवीर नक़वी जी ने लिखा है और एस. मोहिंदर जी के संगीत निर्देशन में, लता मंगेशकर जी ने अपने मधुर स्वर में गाया है।
लीजिए प्रस्तुत है यह मधुर गीत-

गुज़रा हुआ जमाना, आता नहीं दोबारा
हाफ़िज खुदा तुम्हारा।

खुशियाँ थी चार दिन की, आँसू हैं उम्र भर के
तनहाइयों में अक्सर रोयेंगे याद कर के
वो वक्त जो कि हमने, एक साथ है गुज़ारा।

मेरी कसम है मुझ को, तुम बेवफ़ा ना कहना
मजबूर थी मोहब्बत सब कुछ पड़ा है सहना
टूटा हैं ज़िंदगी का, अब आखिरी सहारा।

मेरे लिए सहर भी, आई है रात बनकर
निकला मेरा जनाज़ा, मेरी बरात बनकर
अच्छा हुआ जो तुम ने, देखा ना ये नज़ारा।

आज के लिए इतना ही

नमस्कार।

2 responses to “209. हाफ़िज खुदा तुम्हारा!”

  1. Loved it

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    1. Thanks dear

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